स्वामी विवेकानंद की जीवनी :-Hindi kahaniya


स्वामी विवेकानंद की जीवनी |Biography of swami vivekanand in hindi.

स्वामी विवेकानंद की जीवनी हिंदी मे|Hindi kahaniya

स्वामी विवेकानंद का बचपन।

स्वामी विवेकानंद की माँ भगवान शिव से प्राथना करती हैं और एक पुत्र की कामना करती हैं। भगवान शिव उनके सपने मे आते हैं और कहते हैं चिंता ना करे मै आ रहा हूं।

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 मे सोमवार की सुबह 6:33 सूर्यदय के पहले हुआ था। वह दिन मकर-संक्रांति का था। कोलकता के दत्त परिवार मे इनका जन्म हुआ था। 

दत्ता परिवार अपने समाजिक और इंसानो के हित मे काम करने के लिये जाने जाते थे। स्वामी विवेकानंद के पिता का नाम विश्वनाथ था। वह कोलकता उच्च न्यायालय मे एक वकिल थे। और उनकी माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था। वह एक धार्मिक महिला थी। 【Hindi kahani】

स्वामी विवेकानंद से पहले उनके 2 भाई और 4 बहनो का जन्म हुआ था। जिसमे से 2 की मृत्यु हो गई थी।

विवेकानंद के पिता बहुत सख्ती से विवेकानंद पे नज़र रखते थे। वही दूसरी ओर उनकी माता एक घरेलू महिला थी जिसे पूजा पाठ मे बहुत मन लगता था। जिसके कारन विवेकानंद के घर मे रामायण और महाभारत का बहुत बडा प्रभाव था।


स्वामी विवेकानंद के बचपन का नाम नरेन्द्र दत्त था। वह एक बहुत ही शरारती बच्चे थे। इनकी बचपन की एक घटना बताता हूं। नरेन्द्र संतो को जहां देखते थे। 

उन्हे सब कुछ दे देते थे। जो भी उनके पास होता था। खाने का समान पैसा जो भी हो। यह देख उनके पिता ने उन्हे एक बार कमरे मे बंद कर दिया था। यह ऐसा ही करता रहा तो सब कुछ लूटा देगा।

लेकिन विवेकानंद तो विवेकानंद हैं वह कमरे की खिडकी से संतो को समान दे दिया करते थे। विवेकानंद का दिमाग बहुत तेज था। उन्हे भिजन्स (visions) आते थे।

 अपने visions और अपने तेज दिमाग की वजह से 1871 मे 8 साल की उम्र मे ही उन्हे हाई स्कूल मे दाखिला मिल गया था।

 स्कूल मे होने वाली हर activities मे वह भाग लिया करते थे। फिर चाहे वह पढ़ाई से सम्बंधित हो या खेल कूद से। वह हमेशा से ही एक चंचल छात्र थे। कुछ इस प्रकार इनका बचपन गुजरा था।

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स्वामी विवेकानन्द की शिक्षा|Hindi kahaniya

1879 मे नरेंद्र अपने स्कूल से प्रथम स्थान से ग्रेजुएट होते हैं और अपने आगे की पढ़ाई के लिये कोलकता के presidency कॉलेज मे दाखिला लेते हैं। 

एक साल के बाद उन्होने जेनरल अस्सेंब्ली इंस्टीटयूशन बोर्ड से जुड़े जो की scottish general missionairy द्वारा स्थापित किया गया था। जिसे बाद मे  स्कॉटिश  चर्च कॉलेज के नाम से जाना जाता था।

कॉलेज के प्रिंसिपल और इंग्लिश के प्रोफेसर से पहली बार नरेंद्र ने श्री रामकृष्ण परमहंस का नाम सुना। नरेंद्र ब्रमहो समाज से बहुत प्रभावित थे। 

गुरु से मुलाकात। 

नरेंद्र नवंबर 1881 मे पहली बार रामकृष्ण परमहंस से मिले। पहली ही मुलाकात मे रामकृष्ण परमहंस ने उन्हे अपने साथ रख लिया। एक बार रामकृष्ण परमहंस अपने मित्र सुरेन्द्रनाथ के प्रवचन देने जा रहे थे। तभी उन्होने नरेंद्र को भी अपने साथ ले गये।

प्रवचन मे एक गायक नही आया था। तभी रामकृष्ण ने नरेंद्र को गाने को कहा। नरेंद्र बचपन से ही अध्यात्मिक मे रुचि रखते थे। उन्होने एक भगती गीत गाया जिसे रामकृष्ण परमहंस बहुत प्रभावित हुए। और उन्हे दक्षिण्केश्वर आने का आमंत्रण दे दिया।

रामकृष्ण परमहंस माँ काली के बहुत बड़े भक्त थे। वह दक्षिण्केश्वर के एक काली मंदिर मे पुजारी थे।

1884 मे स्वामी विवेकानंद के पिता विश्वनाथ दत्त की मृत्यु हो जाती है। वो भी एक समाज सेवी थे इसलिये उन्होने कोई धन संपति नही बचाया था। घर की सारी जिमेदारी विवेकानंद जी पे आ जाती है। वह इतने गरीब हो जाते हैं की खाने तक के पैसे उनके पास नही थे। 【Moral stories in Hindi】

एक दिन विवेकानंद ने तय किया की भगवान कुछ नही होते बेहतर यही है की भगवान की भगती और आस्था को छोड़ कर मै कोई काम ढूंढ कर अपने परिवार की देख भाल करू वरना सब के सब मारे जायेंगे।

वह नंगे पैर कड़ी धूप मे इधर उधर काम की तलाश मे घूमते रहते। वह भगवान से सवाल भी पूछते थे। मुझे आपने इतने vision दिया मेरे सपने मे आये। लेकिन आपने मुझे दिया क्या? मुझे तो आपने गरीबी दिखा दिया यही करना था तो मुझे आपने चुना ही क्यूं? इस प्रशन का भगवान ने क्या उतर दिया आगे पढें।

एक दिन स्वामी विवेकानंद एक पेड़ के निचे बैठे होते हैं। तभी अचानक उनको एक vision आता है की भगवान आये और अपना चोगा उतारा उसमे से फिर एक भगवान निकले फिर उन्होने अपना चोगा उतारा उसमे से एक और भगवान निकले ऐसा चलता गया। यह अनंत है अचानक विवेकानन्द सोचते है मै कर क्या रहा हूं। वह भगवान की प्राप्ति और उनमे विलीन होने का मन बना लेते हैं।

विवेकानंद रामकृष्ण परमहंस के पास जाते हैं और अपनी सारी बाते बताते है और कहते हैं। आपको ही मेरे परिवार की देख भाल करनी होगी। रामकृष्ण परमहंस अपने एक शिष्य को भेजते हैं जो विवेकानंद के परिवार की देख भाल करता है।

अब रामकृष्ण विवेकानन्द को पूरी तरह से अपनी शरण मे ले लेते हैं और कहते है मां काली की पूजा करो। पहले तो विवेकानन्द मां काली को मानते नही है। लेकिन आगे वह मानने लगते हैं।

विवेकानंद ध्यान करना शुरु करते है। धीरे धीरे वह अपने इंद्रियों को काबू करने लगते हैं। वह तपस्या मे इतने विलीन होते थे की कभी कभी एक एक सप्ताह तपस्या करते रहते थे।

 वह अकेले नही रामकृष्ण परमहंस भी साथ मे तपस्या किया करते थे। दोनो मिल के खुब तपस्या करते हैं। जितना भी रामकृष्ण परमहंस के पास ज्ञान होता है वह विवेकानंद को दे देते हैं।

फिर एक दिन विवेकानंद को भगवान दर्शन देते हैं। तब वह पूछते हैं की उनको इतनी गरीबी क्यूं मिली है? 

भगवान इसका जवाब देते हुए कहते हैं। पुत्र तुम मेरे स्पैशल बच्चे हो अगर तुम्हे मैंने संपति दे दी होती तो तुम मुझे खोजने कभी नही आती। अगर वो सारी संपति तुम्हे मिल जाती तो नरेंद्र कभी विवेकानंद कभी नही बन पाते।

जब विवेकानन्द को पता चला की रामकृष्ण परमहंस अपने भक्तो से विवेकानन्द को मदद करने की बात करते है। वह बहुत गुस्सा हो जाते हैं और कहते है। एक तरफ तो आप मुझे भक्ति मे भगवान मे विश्वाश करने के लिये कह रहे है और दूसरी ओर मेरे लिये मदद मांग रहे हैं। 【Hindi kahani】

तब रामकृष्ण परमहंस कहते हैं तुम मां काली की तपस्या करो और जो कुछ तुम्हे चाहिये सब मांग लेना उनसे। विवेकानंद काली माता की तपस्या करने लगे जब काली माता ने उन्हे दर्शन दिया तो वह सब धन दौलत मांगना ही भुल गये और सारी चीजे मांग बैठे। ऐसा तीन बार हुआ हर बार वह ज्ञान सुख शांती मांग लेते लेकिंन धन मांगना भूल जाते थे।

तब रामकृष्ण परमहंस ने कहा तुम्हारी नियती है ज्ञान तुम्हारी किस्मत मे यही लिखा है। तुम्हारे किस्मत मे मोक्ष की प्राप्ति है। तुम दुनिया को उपर उठाओ जो भटके हुए लोग हैं उनको सही राह दिखाओ। तुम भगवान के अवतार हो तुम उनके सन्देशक हो। तुम यह बात स्वीकार कर लो।

विवेकानन्द रामकृष्ण परमहंस की बाते मान लेते हैं और ग्रंथो, उपन्यास  और वेदो को पढ़ना शुरु कर देते हैं। एक समय ऐसा आता है जब विवेकानंद के पास बहुत ज्ञान हो जाता वो कुछ भी कर सकते थे।

इसी बिच रामकृष्ण परमहंस को कैनसर हो जाता है। रामकृष्ण परमहंस को यह ऐहसास हो जाता है की वह अब ज्यादा दिन जीवित नही रह पाएंगे। तब वह स्वामी विवेकानंद को बुलाते हैं और कहते है। 

नरेंद्र मैनें तुम्हे सब कुछ दे दिया जो भी मेरे पास था वह सब कुछ अब तुम्हारे पास है। तुम इस ज्ञान को हिन्दुत्व की ताकत उसकी फिलोस्पी भारत के युवयों को दो उन्हे जगाओ।

रामकृष्ण परमहंस विवेकानंद को बहुत प्यार करते थे। उन्हे अपने बच्चे की तरह मानते थे। जब रामकृष्ण परमहंस बिमार थे विवेकानंद उनकी बहुत सेवा करते थे। बिमारी के कारन उनके गले से खून,खखार, थूक निकलता था उनकी पीत दानी भी विवेकानंद खुद फेकते थे।

 यह देख बाकी भक्त चौक जाते हैं। किसी के लिये इतनी निष्ठा प्रेम होना बहुत नया था। आखिर एक दिन रामकृष्ण परमहंस विवेकानंद से कहते हैं मुझे अब मोक्ष की प्राप्ति हो जायेगी मेरी अब कोई इच्छा शेष नही है यह कह कर वह अपनी अंतिम समाधि लेते हैं और इस दुनिया से चले जाते हैं। उनकी मृत्यु हो जाती है।

अपने गुरु की मृत्यु के बाद विवेकानन्द फूट फूट कर रोते हैं। जब उनके गुरु उनके साथ होते थे। विवेकानन्द को एक अलग ताकत का एहसास होता था। उनकी मृत्यु के बाद विवेकानंद तपस्या मे विलीन हो गये थे। कुछ साल वह खुब तपस्या मे विलीन रह्ते थे।

विवेकानंद जात- पात,छुआ- छुत के खिलाफ थे और भारत मे उस समय यह बहुत थी।

तब उन्होने पुरा भारत घूमने का सोचा लोगो को हिंदू संस्क्रति के बारे मे बताने के लिये निकल पड़े। हिमालय से कन्याकुमारी तक का सफर करने निकल पड़े। अपने इस सफर मे वह हर समाज के अलग अलग लोगो से मिलते हैं 

उन्हे वेद का ज्ञान देते हैं हिन्दुत्व की ताकत उसकी उत्पति, भगवान के बारे मे बताते हैं। स्वामी विवेकानंद अपनी बातो से सब को मोह लेते थे सभी उनकी बाते सुनते थे।

4 जून 1891 मे माउंट आबू मे नरेंद पहली बार अजित सिंह से मिलते हैं जो की खत्रियों के राजा थे। उन्होने ही नरेंद को विवेकानंद का नाम दिया। राजा अजित सिंह विवेकानंद के ज्ञान से बहुत प्रभावित होते है। अब तक स्वामी विवेकानंद भारत घूम चुके होते है।

वर्ल्ड कॉन्फरेंस इन शिकागो (अमेरिका)|Hindi kahaniya

1993 मे वर्ल्ड कॉन्फरेंस का आयोजन हुआ। हर देश के प्रतिनिधि अपनी धर्म की प्रचार करने लोगो को बताने उस कॉन्फरेंस मे भाग ले रहे थे। भारत की छवि उन दिनो बहुत खराब थी। राजा अजीत सिंह ने विवेकानंद से कहा आप इस कॉन्फरेंस मे भाग लिजिये आपके इस जर्नी का खर्चा हम उठायेंगे।

स्वामी विवेकानंद जुलाई के अंत मे अमेरिका पहुचते हैं। लेकिन कॉन्फरेंस की तिथी आगे बढ़ा दी जाती हैं और सितम्बर के अंत मे कर दी जाती है। लेकिन विवेकानन्द अपने साथ 4 से 5 दिन का ही पैसा साथ लाये थे। विवेकानंद को दिक्कत हो जाती है। वहां एक theoshopical society होती थी विवेकानंद उन्हे अपनी समस्या बताते हैं तो वो लोग बोलते हैं आप हमारी शिक्षा का प्रचार करिये। हम आपकी रहने की व्यवस्था कर देंगे। लेकिन स्वामी विवेकानंद उनकी शिक्षा से खुश नही थे। उन्होंने मना कर दिया।

लेकिन कुछ अमेरिकन स्वामी विवेकानंद की मदद करने आगे आते हैं और उन्हे अपने घर ले जाते हैं।

11 सितंबर 1993 मे कॉन्फरेंस होता है। सभी धर्मो के लोग आते हैं अपने धर्म की प्रचार करते हैं। सभी लोग अपने भाषण की लम्बी लम्बी लिस्ट लाये रहते हैं। लेकिन स्वामी विवेकानंद खाली हाथ आते हैं। जब वह स्टेज पर जाते हैं। माइक को आगे कर अपने दोनो हाथो को फैलते हुए कहते हैं। मेरे अमिरिकी भाईयों और बहनो।(brothers and sisters of america) कॉन्फरेंस मे बैठे लोग जोर जोर से ताली बजाने लगते हैं 2 मिनट तक खड़े हो कर ताली बजाते हैं। लोग मंत्र मुक्त हो कर स्वामी विवेकानंद को सुनते हैं। 



स्वामी विवेकानंद वेदो,ग्रंथो और कर्म योग का ज्ञान दुुुनिया को  देते हैं। लोगो को बताते हैं भगवान को ढूनढ़ीये, समाज की मदद करिये। इंसानियत को उपर उठाईये। जब विवेकानंद का स्पीच खत्म होता है। वह अचानक लोकप्रिये हो जाते हैं। पेपर मे पहली पेज पर उनका तस्वीर छपता है। 

अमेरिका मे लोग उनको फॉलो करने लगते है। स्वामी विवेकानंद अमेरिका मे 2 साल रहते हैं।

स्वामी विवेकानंद का शिक्षा में योगदान


 वह न्यू यॉर्क मे वेदांता समाज की स्थापना करते हैं। बड़े बड़े ज्ञनियों से जानकार लोगो से मिलते हैं।

अब विवेकानंद अपनी ज्ञान का फैलाने के लिये पूरी दुनिया घूमने लगते है। इसी बिच वह इंग्लैंड मे मार्गरेट नोबेल से मिलते हैं। 

जिसे बाद मे सिस्टर नेवेदिता के नाम से जाना जाता है। सिस्टर नेवेदिता इंडिया मे महिलायें के अच्छाई के लिये बहुत काम करती हैं। 【Moral stories in Hindi】

विवेकानंद 25 मार्च 1895 मे हार्वर्ड के ग्रेजुएट के छात्र के सामने फिलोसफी औफ़ वेदांता का लेक्चर देते हैं।

भारत मे वापसी ।


पूरी दुनिया मे हिन्दुत्व संस्कृति को फैलाने के बाद स्वामी विवेकानंद भारत वापस आते हैं। साउथ भारत मे उनका स्वागत भगवान की तरह किया जाता है। सभी के दिल मे स्वामी विवेकानंद के लिये प्यार था।

भारत लौटने के बाद लोगो को उपर उठाने के लिये गरीबी दूर करने के लिये काम करने लगे। हिमालय मे अद्विता आश्रम की स्थापना करते हैं। सिस्टर निवेदीता को वह बहुत कुछ सिखाते हैं। बेलूर के मठ मे रामकृष्ण परमहंस मिशन की स्थापना करते हैं।

स्वामी विवेकानंद सिस्टर निवेदीता को अपना सारा ज्ञान देते हैं और कहते हैं मेरे बाद तुम इसको आगे बढ़ाना। सिस्टर निवेदीता कोलकाता मे एक गइर्ल्स कॉलेज  भी खोलती हैं।

स्वामि विवेकानंद की मृत्यु कैसे हूई थी? (मोक्ष की प्राप्ति)


1899 मे विवेकानंद फिर से वेस्टर्न देशो का दौरा करते हैं। भारत घूमते हैं। इस बिच उनकी तबियत भी थोड़ी गिरने लगी थी। 

उन्हे स्त्मा भी हो गया था। उनको पता था उनका अंतिम समय निकट है। उन्होने पहले ही बोल दिया था की वह अपना 40वां जन्मदिन नही देख पाएंगे।

वह अपने अंतिम दिनो मे भगवान मे विलीन रहते थे। वह अपनी तपस्या मे बहुत ज्यादा विलीन रहते थे। उनको रामकृष्ण परमहंस का नाम ले कर उठाया जाता था। 

एक दिन स्वामी विवेकानन्द अपने एक भक्त को बोलते हैं मै समाधि मे जा रहा हूं मुझे कोई उठाये नही। यह बोल कर विवेकानंद समाधि मे विलीन हो जाते हैं। 【Hindi kahaniya】

उनके भक्त बहुत चिंतित होने लगते हैं बहुत समय हो जाता है अभी तक स्वामी जी बाहर नही आये। तब एक भक्त जा कर देखता है तो स्वामी विवेकानंद मोक्ष प्राप्त कर चुके होते हैं। 1902 मे 39 साल की उम्र मे उनकी मृत्यु हो जाती है। 


स्वामी विवेकानंद के विचार| quotes by swami vivekananda in  hindi .


  • एक अच्छे चारित्र का निर्माण हजारों बार ठोकर खाने के बाद ही होता है।
  • अपना जीवन एक लक्ष्य पर निर्धारित करो । अपने पुरे शरीर को उस एक लक्ष्य से भर दो। और हर दुसरे विचार को अपने जीवन से निकाल दो। यही सफलता की कुंजी है।
  • किसी दिन,जब आपके सामने कोई समस्या ना आये। आप सुनिश्चित हो सकते है की आप गलत मार्ग पर चल रहे हैं। 
  • जिन्दगी का रास्ता बना बनाया नही मिलता है, स्वयं को बनाना पड़ता है। जिसने जैसा मार्ग बनाया उसे वैसी ही मंजिल मिलती है।
  • ब्रह्माण्ड की सारी शक्तियाँ पहले से हमारी है। वो हम ही हैं जो अपने आंखो पर हाथ रख लेते हैं और रोते हैं की कितना अंधकार है।
  • एक नायक बनो, और सदैव कहो -"मुझे कोई डर नहीं है।"
  • उठो, जागो और तब तक नही रुको जब तक लक्ष्य ना प्राप्त हो जाये।
  • सत्य को हजारो तरीको से बताया जा सकता है, फिर भी वह सत्य ही होगा।
  • बस वही जीते हैं, जो दूसरो के लिये जीते हैं।
  • हम भले ही अपने पुराने सड़े घावों को स्वर्ण से ढक कर रखने की चेष्टा करे, एक दिन ऐसा आयेगा जब वह स्वर्ण वस्त्र खिसक जायेगा और वह घाव अत्यंत वीभत्स रुप मे आंखो के सामने प्रकट हो जायेगा।
  • संभव की सीमा जानने का एक ही तरीका है, असंभव से भी आगे निकल जाना।
  • जीवन मे ज्यादा रिश्ता होना जरुरी नही है, पर जो रिश्ते हैं उनमे जीवन होना जरुरी है।
  • जितना बड़ा संघर्ष होगा जीत उतनी ही बड़ी होगी।
  • दिन मे एक बार स्वयं से बात करे, अन्यथा आप एक बेहतरीन इंसान से मिलने का मौका चूक जायेंगे।
  • आकांक्षा,अज्ञानता और असमानता- ये बंधन की त्रिमूर्तियां हैं।
  • कुछ सच्चे,ईमानदार और ऊर्जावान पुरूष और महिलाएं, जितना कोई भीड एक सदी मे कर सकती है उसे अधिक वह एक वर्ष मे कर सकते हैं।
  • दुनिया मजाक करे या तिरस्कार, उसकी परवाह किये बिना मनुष्य को अपना कर्तव्य करते रहना चाहिये।
  • जिस तरह से विभिन्न स्रोतों से उत्पन्न हूई धाराएँ अपने जल को समुद्र मे मिला देती है। उसी प्रकार मनुष्य द्वारा चुना हर मार्ग,चाहे वह अच्छा हो या बुरा भगवान तक जाता है।
  • किसी की निंदा ना करें। अगर आप मदद के लिये हाथ बढ़ा सकते हैं तो जरूर बढायें। अगर नही बढ़ा सकते तो अपने हाथ जोड़ीये और आशीर्वाद दिजीये और उन्हे उनके मार्ग पर जाने दिजीये।
  • कभी मत सोचिये की आत्मा के लिये कुछ असम्भव है। ऐसा सोचना सबसे बडा विधर्म है। अगर कोई पाप है तो यही है; ये कहना की तुम निर्बल हो या अन्य निर्बल है।
  • हम वो है जो हमारी सोच ने हमे बनाया है,इसलिए इस बात का ध्यान रखिये की आप क्या सोचते हैं। शब्द गोण हैं, विचार रहते हैं, वे दूर तक यात्रा करते है।
  • बाहरी स्वभाव केवल अंदरूनी स्वभाव का बड़ा रुप है।
  • डर निर्बलता की निशानी है।
  • जिस शिक्षा से हम अपने जीवन का निर्माण कर सके,मनुष्य बन सके, चारित्र का गठन कर सके और समंनज्स्य कर सके। वही वास्तव मे शिक्षा कहलाने योग्य है।
  • भय और अधुरी इच्छाये ही, समस्त दुखों का मुल है।
  • लगातार पवित्र विचार करते रहें, बुरे संस्कारों को दबाने का एकमात्र समाधान यही है।
  • सबसे बड़ा धर्म है अपने स्वभाव के प्रति सच्चे होना। स्वयं पर विश्वास करो।
  • जो अग्नि हमे गर्मी देती है, वो अग्नि हमे नष्ट भी कर शक्ती है। यह अग्नि का दोष नही है।
  • जीवन का रहस्य भोग मे नहीं, अनुभव के द्वारा शिक्षा प्राप्ति मे है।
  • धन्य है वो लोग जिनके शरीर दूसरो की सेवा करने मे नष्ट हो जाते है।
  • विश्व मे अधिकांश लोग इसलिए असफल हो जाते हैं, क्युंकि उनमे समय पर साहस का संचार नहीं हो पाता। वो भयभीत हो उठते हैं।

सवाल जवाब


प्रस्न-: स्वामी विवेकानंद जी का जन्म कब हुआ था?

उत्तर-: स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 मे सोमवार की सुबह 6:33 सूर्यदय के पहले हुआ था।

प्रस्न-: स्वामी विवेकानंद ने किसकी स्थापना की थी?

उत्तर-: वह न्यू यॉर्क मे वेदांता समाज की स्थापना करते हैं। हिमालय मे अद्विता आश्रम की स्थापना करते हैं। बेलूर के मठ मे रामकृष्ण परमहंस मिशन की स्थापना करते हैं। 

प्रस्न-: स्वामी विवेकानंद क्या काम करते थे?

उत्तर-: स्वामी विवेकानंद एक संत थे । और वो लोगो को हिंदु संस्कृति के बारे में बताते थे।
 
प्रस्न-: स्वामी विवेकानंद के पिता क्या करते थे?

उत्तर-: स्वामी विवेकानंद के पिता का नाम विश्वनाथ था। वह कोलकता उच्च न्यायालय मे एक वकिल थे। 


निष्कर्ष 

अगर आप यह पढ़ रहे हैं तो यहां तक आने के लिये धन्यवाद मुझे आशा है की आपको  विवेकानंद की जीवनी हिंदी में |Hindi kahaniya|Hindi kahani|Moral stories in hindi की हिन्दी कहानी पसंद आई होगी ।


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