Navratri 2021 : महिषासुर का रक्त यहां मौजूद है जिसने भी उसे देखा वह अंधा हो गया


Navratri 2021 : महिषासुर का रक्त यहां मौजूद है जिसने भी उसे देखा वह अंधा हो गया

Navratri 2021 - इस post का overview

 इस post में आप जानेंगें कहाँ महिषासुर का रक्त अभी भी preserved है? नवरात्रि क्या है? और कब मनाया जाता है? नवरात्रि मे जौ क्यू बोये जाते हैं?


नवरात्रि क्या है ? नवरात्रि कब से शुरु है?

नवरात्रि भारत मे मनाया जाने वाले मुख्य त्योहारों मे से एक है। यह पर्व हिंदूयों का है जो 9 रातें और 10 दिन तक चलता है।

 नवरात्रि का मतलब संस्कृत मे 9 रात्रि और 10 दिन होता है। 10वे दिन को दशहारा कहते हैं। इन 9 रात्रि और 10 दिनो मे दुर्गा माता/शक्ती की 9 रुपों की पूजा अर्चना की जाती है।

 नवरात्रि वर्ष मे दो बार मनाया जाता है। एक नवरात्रि चैत्र महीने मे मनाई जाती है, तो दूसरी नवरात्रि अश्विन महीने मे मनाई जाती है।

इस बार यह पर्व 13 अप्रैल 2021 मंगलवार से शुरु हो गया है। मां दुर्गा के 9 अलग अलग रूपों की पूजा अर्चना की जायेगी। इन 9 दिनो मे मां दुर्गा की किस किस रूप की पूजा अर्चना की जायेगी आइये जाने।

1. मां शैलपुत्री

मां शैलपुत्री पर्वतराज हिमालय की पुत्री है। नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की अर्चना की जाती है और मां को गाय की घी से बने पकवानो से भोग लगाया जाता है। 

इसे साधको के मन का मुलधारक चक्र जाग जाता है जिसे साधको को रोग और संकट से मुक्ति मिलती है।

2. मां ब्रह्मचारिणी

मां ब्रह्मचारिणी की पूजा नवरात्र के दुसरे दिन की जाती है। इस दिन मां को पंचमृत और शक्कर का भोग लगाया जाता है। 

जो लोग मां की इस रूप की अर्चना करते हैं उन्हे त्याग, तप, वैराग्य, धैर्य की प्राप्ति होती है। मां इस रूप मे अपने हाथो मे माला और कमण्डल धरण करती है।

3. मां चंद्रघंटा

नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। इस अवतार मे मां माथे पर अर्ध चांद धारण करती है और शेर पर शवार हो कर आती हैं। 

और घंटे की आवाज से सारी बुराईयां, बरी शक्तियाँ डरती है और आस पास नही भटकती वह दूर भागते हैं। 

मां चंद्रघंटा की अर्चना करने से सारे कष्टो से मुक्ति मिलती है। मां को गाय के दूध से भोग लगाया जाता है।

4. मां कूष्माण्डा

मां कूष्माण्डा की पूजा अर्चना नवरात्रि के चौथे दिन की जाती है। मां को मालपुए का भोग लगाया जाता है।

 मां कूष्माण्डा की अर्चना करने से आपको बल, यश, और आयु की प्राप्ति होती है। जब पूरी संसार मे अंधेरा था तब मां ने ब्रह्मांड की रचना की थी।

5. मां स्कंदमाता

मां स्कंदमाता की पूजा नवरात्र के पांचवे दिन की जाती है। भगवान कार्तिक की माता होने के कारन यह स्कंदमाता के नाम से भी प्रसीद्ध हैं। 

मां की पूजा करने वाले सभी सुखो को भोगते हैं। मां स्कंदमाता को केले का भोग लगाया जाता है।

6. मां कात्यायनी

नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। महर्षि कात्यायन के तपस्या से प्रसन्न हो कर माता आधिशाक्ति ने कात्यायन के घर पुत्री के रूप मे जन्म लिया था।

 इस दिन साधको को आलौकिक तेज की प्राप्ति होती है। जीवन मे खुशहाली का आगमन होता है भय , शोक दूर होते हैं। मां को मध (शहद) का भोग लगाया जाता है।

7. मां कालरात्रि

मां कालरात्रि की पूजा अर्चना नवरात्रि के सातवें दिन की जाती है। मां का यह रूप सभी राक्षसों के लिये काल है।

 सभी भूत पिसाच और किसी भी तरह का भय मां के स्मरण करने से भी भाग जाता है। मां कालरात्रि को गुड़ का भोग लगाया जाता है।

8.मां महागौरी

नवरात्रि के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है। इस दिन को अष्ठमी भी कहा जाता है। मां के इस रूप अन्नपूर्णा भी कहा जाता है। 

मां ने काली रूप मे धारण करने के बाद बहुत तपस्या कर वापस इस रूप को धारण किया था। 

इस दिन सभी लोग उपवास रखते हैं, इस दिन की पूजा करने वाले साधको को आर्थिक लाभ होता है। मां को इस दिन हलवे और पूरी का भोग अर्पित किया जाता है।

9. मां सिद्धिदात्री

नवरात्रि के 9वें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। मां की कृपा जिस पर हो जाती है उसे किसी चीज़ की कमी नही होती। मां अपने साधको को ऋधिया और सीधीयां प्रदान करती हैं।

 इस दिन मां को अनेको प्रकार के अनाजो से बने पकवानो का भोज लगाया जाता है। खीर, पूआ, हलवा पूरी भोग लगाने के बाद उसे गरीबो मे दान किया जाता है।

नवरात्रि मे जौ क्यू बोये जाते हैं?

नवरात्रि मे जौ क्यू बोये जाते हैं किसी और आनाज की फसल क्यूं नही बोइ जाती? इसके पीछे का कारण की जौ हिंदू धर्म और ग्रंथो के मुताबित सृष्टि के शुरुआत के बाद धरती पर जो सबसे पहला फसल उगा था वह जौ था।


 इसलिए जौ को सभी पूजा पाठों मे प्रयोग किया जाता है और हवन मे भी जौ का उपयोग होता है। जौ को अन का ब्रह्म भी कहा जाता है इसलिए हम अन्न का सम्मान करते हैं।

मान्यता के आनुशार नवरात्रि मे बोया हुआ जौ भविष्य का संकेत भी देता है। कहा जाता है की अगर जौ बोने के बाद 2 से 3 दिन मे अंकुरित हो जाता है तो यह एक शुभ संकेत माना जाता है इसका मतलब होता है की माता प्रसन्न है।


मां दुर्गा की उत्पति कैसे हुई?

एक बार एक महिषसुर नाम का असुर ने देवो की उपासना कि। उसके उपासना और भक्ति से प्रसन्न हो कर देवताओं ने उसे अमर होने का वरदान दे दिया। 

वरदान प्राप्त होने के बाद महिषासुर ने चारो तरह तबाही मचानी शुरु कर दी। उसे अपने शक्तियों का दुरुपयोग करना शुरु कर दिया। उसे नर्क को स्वर्ग तक विस्तार कर दिया। 

महिषासुर ने देव लोक पर भी आक्रमण किया और स्वर्ग को भी जीत लिया उसे सूर्य, चंद्र, इंद्र, अग्नी, वायू, यम, वरुण और अन्य देवी देवताओं के अधिकार छिन लिया और खुद स्वर्ग लोग का मालिक बन गया। 

इसे परेशान हो कर सभी देवता ब्रह्मदेव के पास गये और महिषासुर को खत्म करने का उपाय पूछा। तब ब्रह्मदेव ने बताया की उसका वध एक कुवारी कन्या ही कर सकती है।

इसलिए सभी देवतावों ने अपने अपने तेज को एकत्रित कर मां दुर्गा को उत्पन किया। महिषासुर को मारने के लिये मां दुर्गा को अधिक से आधिक शक्तियाँ चाहिये थी।

 सभी देवतावों ने अपने सभी अस्त्र शस्त्र उन्हे प्रदान किया, महादेव ने अपनी त्रिशूल, भगवान विष्णु ने अपना चक्र, और बाकी सभी देवताओ ने अपने शस्त्र माता को दिया।

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 जिसे वह अत्यंत शक्तिशाली हो चुकी थी। 9 दिनो के कठिन युध्द के बाद मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया। 

इसलिए मां दुर्गा को महिषासुर मर्दनी भी कहा जाता है। इसके साथ ही महिषासुर के पापो का अंत हुआ और स्वर्ग लोक  देवताओं को वापिस  मिल गया ।

महिषासुर का रक्त यहां मौजूद है जिसने भी उसे देखा वह नेत्रहीन हो गया

मृकुला देवी मंदिर मे आज भी महिषासुर का रक्त मौजूद है। कहा जाता है की मां की प्रमुख प्रतिमा के पीछे मां काली का खप्पर रखा हुआ है जिसमे महिषासुर का रक्त मौजूद है।

 उस खप्पर को देखने की इजाजत किसी को नही है। कहा जाता है की जो भी उसे देखता है वह अन्धा हो जाता है उसकी आंखो की रौशनी चली जाती है।


मृकुला देवी मंदिर कहां है?

मृकुला देवी मंदिर लाहौल घाटी मे मौजूद है। इस मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है। 

इस मंदिर की स्थापना के पीछे की कहानी यह है की "एक दिन भीम एक बड़े विशाल वृक्ष को कही से उखाड़ कर लाये और इस जगह पर लगा दिये और एक पत्थर को रख ब्रह्म जी से निवेदन किया की यहां एक मंदिर की स्थापना करे। तब ब्रह्म जी एक इस मदिर की स्थापना की और यह सिर्फ एक दिन मे बन की तैयार हो गया था।

इस मंदिर की दिवारो और मंदिर के अंदर रामायण और महाभारत काल के युग की कलाकृति देखने को मिलती है।

 इस मदिर मे पितामह भीष्म की बानो पर लेटे हूए, सीता माता का हरण, सागर मंथन, कृष्ण और अर्जून, अभिमन्यु का चक्रभियू, द्रौपदी का स्वयंवर, अशोक वाटिका, गांगा यमुना, महादेव की तीसरी आंख का खुलना और ना जाने अनेको चित्रो और कलाकृती से भरी हूई है यह मंदिर।

मृकुला देवी मंदिर की कहानी और मान्यता 

मंदिर के दो द्वारपाल है एक बजरंगबली और दुसरे भैरो है। इस मंदिर मे "चलो यहां से चलते हैं " बोलना निषेध है।

 सभी श्रद्धालुयो को यह कहा जाता है की दर्शन और पूजा के बाद भूल कर भी यह ना बोले पूजा के बाद शांती से चुप चाप मंदिर से बाहर आये। 

 इसके पिछे का कारन यह है की मान्यता के अनुसार जब आप बोलते है की "चलो यहां से चलते है तब मदिर के द्वार पर खड़े बजरंग बली और भैरो भी आपके साथ चल पडते है।

 जिसे आपके और आपके परिवार को कुछ अनहोनी और विपदा का सामना करना पड़ सकता है।


अगर आप यह पढ़ रहे हैं तो यहां तक आने के लिये धन्यवाद मुझे आशा है की आपको Navratri 2021 : महिषासुर का रक्त यहां मौजूद है जिसने भी उसे देखा वह अंधा हो गया की हिन्दी कहानी पसंद आई होगी ।

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